Tuesday, September 9, 2008
धर्म की हकीकत - उड़ीसा में अत्याचार
धर्म, इंसानियत के नाम पर गाली बनता जा रहा है। सिर्फ धर्म के नाम पर हिंदू-मुस्लिम दंगे होते हैं तो धर्म के नाम पर हिंदुत्ववादी इंसानों का खून बहाने और उनके आराधनास्थलों को तोड़ने, जलाने या क्षति पहुँचाने से बाज़ नहीं आते।
मैं भी हिंदू हूँ, पर मुझे इस बात में कतई कोई औचित्य समझ नहीं आता कि निरीह इंसानों को मौत के घाट उतारकर कौन सा सदकर्म हम करते हैं। उड़ीसा में हो रहे अत्याचार के पीछे दिये गये विहिप और भाजपा के कुछ नेताओं के बयान कुछ ऐसे हैं कि वे (ईसाई) हमारे मंदिरों को तोड़ रहे हैं, हमारे लक्ष्मानंद गुरूजी को मार डाला। पहली बात तो मैं इस बात से सहमत ही नहीं हुँ कि ईसाईयों ने लक्ष्मानंद जी का खून किया, परंतु अगर किसी ने एक गलती की तो हमको कौन सा गलती करने का लाइसेंस मिल जाता है।
उसके अलावा एक व्यक्ति की मृत्यु के बदले सैंकड़ों लोगों पर अत्याचार करना, गर्भवती महिलाओं को दौड़ाना कि उनका गर्भ ही गिर जाये, महिलाओं और बच्चों तक को मारना और डराना कि उन्हें जंगलों में शरण लेनी पड़े, नन और एक व्यक्ति को जिंदा जला देना, यह सब कहाँ का न्याय है। यदि मंदिरों को तोड़ा जा रहा है तो फिर उसकी खबर क्यों नहीं बनती, जबकि चर्चों के जलाये जाने की, उन पर पत्थर फेंकने की, सत्संग कर रहे लोगों के साथ मारपीट करने की, खबरें आम हो गई हैं।
क्या ईश्वर इससे सच में खुश हो रहा होगा? अगर आप सोचते हैं कि ईश्वर हमारे अंदर रहता है तो एक व्यक्ति की धर्म के नाम पर हत्या करके आप क्या सोचते हैं, आप ईश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्या आप सोचते हैं कि आप मोक्ष का मार्ग तय कर रहे हैं? पाप और पुण्य की बात करने वाले हम किस चौराहे पर खड़े हैं कि हमें सही मार्ग दीख ही नहीं पड़ रहा। धर्म को छोड़कर कुछ देर हम इंसानियत की बात क्यों न करें।
राजनैतिक दलों को तो मुद्दों की ज़रूरत है, उनके बहाव में आकर आम आदमी का कत्ल करना क्या सही है? वे तो कीचड़ को हाथ में लेकर अपने भी लगाते हैं और दूसरों के भी। फिर अपने आप को साफ करके निकल लेते हैं और दूसरों पर उनके किये के निशान पड़े रहते हैं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, परंतु यहाँ प्रजातंत्र की धुरी (प्रजा) को ही नाश किया जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष भारत की कौन सी परिभाषा डॉ. अम्बेड़कर हमारे संविधान में देकर गये थे और कौन सी परिभाषा का पालन हम कर रहे हैं?
क्या ऐसे ही होगा - मेरा भारत महान?
क्या ऐसे ही लुटती रहेगी अस्मत इंसानियत की?
क्या ऐसे ही धर्म का दानव रोंदता रहेगा मानवीयता को?
क्या ऐसे ही अंधे, बहरे और गूंगे होकर बैठे रहेंगे आप और हम?
क्या हमारे पढ़े लिखे होने का यही फायदा है कि अनपढ़ नेता हमारी अगुवाई करें?
External Links
News and Blogs
1. Letter to Orissa Chief Minister
2. Dalit Freedom Network
3. Violence against Christians
4. World - Asia - India - Orissa - Wikio News
5. Christians protests peacefully - TOI News
6. Indian government pressed to take actions
7. Hindu violence against Christians
8. Mangalore Church brings memorandum
9. Orissa Burning Blog
10. Gospel for Asia - Orissa Update
मैं भी हिंदू हूँ, पर मुझे इस बात में कतई कोई औचित्य समझ नहीं आता कि निरीह इंसानों को मौत के घाट उतारकर कौन सा सदकर्म हम करते हैं। उड़ीसा में हो रहे अत्याचार के पीछे दिये गये विहिप और भाजपा के कुछ नेताओं के बयान कुछ ऐसे हैं कि वे (ईसाई) हमारे मंदिरों को तोड़ रहे हैं, हमारे लक्ष्मानंद गुरूजी को मार डाला। पहली बात तो मैं इस बात से सहमत ही नहीं हुँ कि ईसाईयों ने लक्ष्मानंद जी का खून किया, परंतु अगर किसी ने एक गलती की तो हमको कौन सा गलती करने का लाइसेंस मिल जाता है।
उसके अलावा एक व्यक्ति की मृत्यु के बदले सैंकड़ों लोगों पर अत्याचार करना, गर्भवती महिलाओं को दौड़ाना कि उनका गर्भ ही गिर जाये, महिलाओं और बच्चों तक को मारना और डराना कि उन्हें जंगलों में शरण लेनी पड़े, नन और एक व्यक्ति को जिंदा जला देना, यह सब कहाँ का न्याय है। यदि मंदिरों को तोड़ा जा रहा है तो फिर उसकी खबर क्यों नहीं बनती, जबकि चर्चों के जलाये जाने की, उन पर पत्थर फेंकने की, सत्संग कर रहे लोगों के साथ मारपीट करने की, खबरें आम हो गई हैं।
क्या ईश्वर इससे सच में खुश हो रहा होगा? अगर आप सोचते हैं कि ईश्वर हमारे अंदर रहता है तो एक व्यक्ति की धर्म के नाम पर हत्या करके आप क्या सोचते हैं, आप ईश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्या आप सोचते हैं कि आप मोक्ष का मार्ग तय कर रहे हैं? पाप और पुण्य की बात करने वाले हम किस चौराहे पर खड़े हैं कि हमें सही मार्ग दीख ही नहीं पड़ रहा। धर्म को छोड़कर कुछ देर हम इंसानियत की बात क्यों न करें।
राजनैतिक दलों को तो मुद्दों की ज़रूरत है, उनके बहाव में आकर आम आदमी का कत्ल करना क्या सही है? वे तो कीचड़ को हाथ में लेकर अपने भी लगाते हैं और दूसरों के भी। फिर अपने आप को साफ करके निकल लेते हैं और दूसरों पर उनके किये के निशान पड़े रहते हैं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, परंतु यहाँ प्रजातंत्र की धुरी (प्रजा) को ही नाश किया जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष भारत की कौन सी परिभाषा डॉ. अम्बेड़कर हमारे संविधान में देकर गये थे और कौन सी परिभाषा का पालन हम कर रहे हैं?
क्या ऐसे ही होगा - मेरा भारत महान?
क्या ऐसे ही लुटती रहेगी अस्मत इंसानियत की?
क्या ऐसे ही धर्म का दानव रोंदता रहेगा मानवीयता को?
क्या ऐसे ही अंधे, बहरे और गूंगे होकर बैठे रहेंगे आप और हम?
क्या हमारे पढ़े लिखे होने का यही फायदा है कि अनपढ़ नेता हमारी अगुवाई करें?
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1. Letter to Orissa Chief Minister
2. Dalit Freedom Network
3. Violence against Christians
4. World - Asia - India - Orissa - Wikio News
5. Christians protests peacefully - TOI News
6. Indian government pressed to take actions
7. Hindu violence against Christians
8. Mangalore Church brings memorandum
9. Orissa Burning Blog
10. Gospel for Asia - Orissa Update
